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वे जंग लगी लूम की मशीनें देखते हैं, कूड़े में कुछ उलझे धागों के गुच्छे हैं; कहते हैं, कभी हम सेठ थे, फिर मजदूर हुए, अब गांव लौटकर जाने क्या होंगे

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दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए…

13वीं स्टोरी, बुनकरों के गांव से:

श्याम लाल और दिनेश आर्य घर में रखी जंग लगी लूम की मशीने खोल-खोल कर देख रहे हैं। एक ओर कूड़े में धागों के उलझे गुच्छे हैं। दोनों आज हरिद्वार से गांव रानीपुर लौटे हैं। पुराने दिन याद करते हुए कहते हैं, ‘कभी हम सेठ हुआ करते थे, फिर मजदूर हो गए, अब गांव लौटे हैं, पता नहीं अब क्या होंगे।’खेती के लिए इनके पास जमीनें नहीं हैं। लूम का काम खत्म हो चुका है। फिलहाल गांव में मजदूरी भी नहीं है।

आज रानीपुर गांव के लोगों के पास न तो धागा है और न ही मशीनें।

दिनेश और श्यामलाल गांव के दस लोगों के साथ आज ही तीस हजार रुपए में टेंपो ट्रैवलर से गांव लौटे हैं। 12 लोगों के लिए हर एक सवारी ने 2500 रुपए दिए। ये लोग वहां मोती-माला की दुकानों पर काम किया करते थे। हैरानी की बात यह है कि एक जमाने में ये लोग यहां के संपन्न लोग हुआ करते थे। मजबूरी ऐसी रही कि पुश्तैनी लूम का काम छोड़कर ये लोग धीरे-धीरे पलायन करने लगे। सूरत और चीन के सामान की वजह से यहां के माल की मांग कम होती चली गई। नेताओं और सरकारों ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया। सरकारी अनदेखी के चलते दुनिया में मशहूर यहां का कारोबार बर्बाद हो गया।

अब लोगों के पास फिर से कमाने-खाने का संकट खड़ा हो गया है।

दिनेश आर्य का कहना है, ‘इसे झांसी का छोटा मेनचेस्टर कहते थे। बुनकरों का यह गांव ‘रानीपुर टैरीकॉट’ के नाम से पूरी दुनिया में मशहूर था। हमारे बनाए कालीन, कपड़े, तौलिए, गमछे यहां से मंडी में जाते थे, जिसे देशभर के होलसेलर खरीदा करते थे। लेकिन जैसे-जैसे गुजरात का सूरत शहर चमकता गया हमारा काम ठंडा होता चला गया। धागा महंगा हो गया। हमें घाटा होने लगा, सरकारों ने हमारी मदद नहीं की, हमारा सामान होलसेलरों ने खरीदना बंद कर दिया। धीरे-धीरे लूम को जंग लगने लगी।’

लूम खराब होने और कहीं से कोई मदद न मिलने से लोग परेशान हैं।

1999 तक लूम पर बने कपड़े में इस इलाके का देशभर में जलवा रहा लेकिन फिर धीरे धीरे लोगों ने लूम का काम छोड़ दिया। बुनकर मज़दूर बन गए। सूरत समेत दूसरे शहरों की ओर पलायन कर मजदूरी करने लगे। श्यामलाल का कहना है कि अब हम 2000 के बाद गांव लौटे हैं, लेकिन न तो हम बुनकर रहे और न मजदूर। खेती के नाम पर किसी के पास जमीन नहीं है। इसलिए अभी पता ही नहीं है कि हम लोग क्या करेंगे।

बंद पड़ीं लूम अपनी कारोबार खत्म होने की कहानी खुद बयां करती है।

श्यामलाल का कहना है कि अगर हम कपड़ा बुनना शुरू भी करें तो हमारा कपड़ा बिकता ही नहीं है, किसे और कहां बेचे और न ही अब रानीपुर के कप़ड़े की मांग है। धर्मेंद्र का कहना है कि टर्नओवर की जहां तक बात है तो करोड़ों में था। यहां तक कि बुनकर समाज के बिहारीलाल मंत्री भी रह चुके हैं। रानीपुर समेत आसपास के गांवों में इन बुनकरों की संख्या 80,000 है। सभी के सभी यहां से पलायन कर चुके थे। लौट तो आए हैं लेकिन बुनाई का काम बंद है। यहां का कपड़ा बाज़ार खत्म हो चुका है।

लोग गांव तो लौट आए हैं, लेकिन कपड़ा बाजार खत्म हो चुका है।

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