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पति और बेटा भूखे न रहें इसलिए कई दिन खाना नहीं खातीं प्रियंका, उन्हें डर है कि कहीं भीख मांगने की नौबत न आ जाए

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अंकिता मुखोपाध्याय. यह कहानी है प्रियंका कुमारी की। प्रियंका बेहतर कल कीउम्मीद में बिहार सेगुरुग्राम आई थीं। लेकिन कोरोना और लॉकडाउन ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। पहले लॉकडाउन के कारणपति की नौकरी चली गई। दोबारा मिली तो तनख्वाह आधी हो गई। प्रियंका यहां एक झुग्गी में मुश्किल से गुजारा कर रही हैं। वह अपनी बस्ती केआसपास कचरे के कारण स्वास्थ्य को लेकर भी खासी चिंतित हैं। हालांकि, प्रियंका कोरोनावायरस के बारे में कुछ ज्यादा जानती नहीं हैं।

जानकारी कम होने के बाद भी सतर्क
प्रियंका कहती हैं कि वे झुग्गी छोड़ना चाहती हैं और अगर महामारी नहीं फैली होती तो उनका परिवार बड़े घर में पहुंच गया होता। मैं घर में आने से पहले लोगों से हाथ सैनिटाइज करने के लिए कहती हूं। यहां तक कि मैं स्वास्थ्य की चिंता के कारण अपने बच्चों को दूसरे बच्चों के साथ नहीं खेलने देती।

जाओ बिहार में खाना लो, यहां तुम्हारे लिए कुछ नहीं है
प्रियंका को राशन के लिए रजिस्टर कराने के लिए जब लोकल हेल्पलाइन नंबर पर फोन किया गया तो सामने से आवाज आई “जाओ बिहार में खाना लो, यहां तुम्हारे लिए कुछ नहीं है।हालांकि प्रियंका इस बात से बिल्कुल भी हैरान नहीं थीं। ये लोग हमेशा ऐसा करते हैं।”

प्रियंका ने बताया कि वे इस बात से डरी हुईं हैं कि महामारी के कारण उन्हें भीख न मांगनी पड़ जाए। राशन हासिल करने की हर कोशिश नाकाम हुई है। मैं कई दिनों तक बिना खाने के रहती हूं, क्योंकि आजकल मेरा खाने का मन नहीं होताहै, मैं चाहती हूं कि कोरोना चला जाए। मैं इसलिए नहीं खाती हूं, क्योंकि हमारे पास सीमित खाना है। मैं नहीं चाहती कि मेरे पति और बच्चे भूखे रहें।

प्रियंका के पति कमलेश (28) आर्थिक हालात को लेकर आशावादी हैं। उन्हें लगता है कि आने वाले वक्त में सब ठीक हो जाएगा।

बेरोजगारी, आधी तनख्वाह, मकान मालिक का डर
प्रियंका के पति कमलेश शोरूम में काम करते हैं। मार्च में लॉकडाउन के बाद उनकी नौकरी चली गई थी, लेकिन मई में उन्होंने दोबारा काम पर जाना शुरू किया। हालांकि उनका वेतन 14 हजार से कम कर 7 हजार कर दिया गया। इसके अलावा उन्हें अभी भी मई और जून का वेतन नहीं मिला।

कमलेश कहते हैं कि महामारी के सबसे बुरे दौर में उन्हें खाने के लिए परिवार से पैसे उधार लेने पड़े। हालांकि वह अपने मकान मालिक की तारीफ करते हैं, कहते हैं कि उन्होंने हमें किराए के लिए बिल्कुल परेशान नहीं किया। कमलेश ने एक घर में खाना बनाने का भी काम किया, लेकिन उन्हें पैसे नहीं मिले।

बेटा अनपढ़ न रह जाए, इसलिए गांव वापस नहीं जाना
प्रियंका कहती हैं कि वास्तव में मैं गांव लौटना नहीं चाहतीं। मैंने गांव में अपनी शिक्षा पूरी नहीं की, क्योंकि आप गांव के स्कूल की हालत जानते हैं। वहां शिक्षा को बढ़ावा नहीं दिया जाता। मेरे पैरेंट्स ने मेरी जल्दी शादी कर दी, क्योंकि वे अपने बच्ची की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। मैं गांव वापस नहीं जाना चाहती, क्योंकि वहां मेरा बेटा भी अशिक्षित रह जाएगा।

टीवी कनेक्शन के नहीं हैं पैसे
19 साल की प्रियंका कहती हैं कि मुझे इसके बारे में कुछ नहीं पता, मैं मास्क इसलिए पहनती हूं, क्योंकि सभी लोग पहनते हैं। मुझे पता है कि यह चीन और वहां के एक व्यक्ति से आया है, जिसने चमगादड़ खा लिया था।वह बताती हैं कि शुरुआत में मुझे टीवी के जरिए जानकारी मिलती थी, लेकिन अब पैसे नहीं होने के कारण हमें कनेक्शन कटवाना पड़ा। मेरे पास स्मार्टफोन नहीं है, इसलिए मैं फोन पर न्यूज नहीं देख सकती। मैं न्यूज के लिए पति पर निर्भर हूं।”

सरकार से सभी को मदद नहीं मिली

सरकार के दावों के मुताबिक, जरूरतमंदों के लिए शेल्टर कैंप्स, फ्री राशन और पैसों की मदद की जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है, प्रियंका अपने परिवार को खाना खिलाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। बिहार का राशन कार्ड होने के कारण उन्हें लोकल दुकान से वापस भेज दिया गया। पका हुआ खाना बांटने की जिम्मेदारी कम्युनिटी सेंटर की थी, जो अप्रैल से बंद पड़ा है।

एक स्थानीय पुलिसकर्मी के मुताबिक, एक ही परिवार के लोग फ्री सर्विस का फायदा उठाने लगे थे, इसलिए कम्युनिटी सेंटर ने खाना वितरित करना बंद कर दिया है। गरीब लोग ऐसे ही होते हैं।हरियाणा सरकार ने एक जून से फ्री राशन सेवा बंद कर दी है, क्योंकि उन्हें लगता है कि लॉकडाउन से प्रभावित हुए प्रवासी मजदूर फिर से काम करने लगे हैं और उन्हें मुफ्त खाने की जरूरत नहीं है।

लॉकडाउन सेप्रवासी बुरी तरहप्रभावित

  • भारत में मार्च में लॉकडाउन की घोषणा हो गई थी। ऐसे में सबसे ज्यादा प्रभावित प्रवासी मजदूर हुए थे। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लॉकडाउन ने 4 करोड़ आंतरिक प्रवासियों के जीवन को प्रभावित किया है। घरेलू कामगार यूनियन की सदस्य और श्रमिक इतिहासकार माया जॉन के मुताबिक, लॉकडाउन ने प्रवासी मजदूरों के बीच चिंता और तनाव को बढ़ाया है।
  • माया कहती हैं कि लॉकडाउन ने प्रवासी महिलाओं को सर्विस क्लास से भिखारियों की कैटेगरी में ला दिया है। वेहमेशा इस बात पर गर्व करती थीं कि हम ऐसे समुदाय से हैं, जो कड़ी मेहनत कर पैसा कमाता है। अब उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है। लॉकडाउन के कारण बढ़ी घबराहट झुग्गियों में लोगों को पानी जैसी बुनियादी चीजों पर लड़ने के लिए मजबूर कर रही है।

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प्रियंका कहती हैं कि मैं गांव लौटना नहीं चाहतीं। क्योंकि मुझे अपने बेटे को आगे पढ़ाना है, गांवों में अच्छे स्कूल नहीं हैं।