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कहानी काशी की दीवानी अदालत के एक मुकदमे की, जो काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद का भविष्य तय करेगा

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90 के दशक की शुरुआत पूरे देश में एक सांप्रदायिक धमक के साथ हुई थी। राम मंदिर आंदोलन तब अपने चरम पर था और शुरुआती सालों में ही यह इतना विकराल हुआ कि बाबरी मस्जिद गिरा दी गई। ‘अयोध्या तो झांकी है, काशी मथुरा बाकी है’ जैसे नारे उछाले जाने लगे और इसके प्रभाव से महादेव की नगरी काशी में भी अछूती नहीं रही।

उस दौर में एक तरफ यह आंदोलन सड़कों पर हिंसक रूप ले रहा था तो दूसरी तरफ अदालतों में भी मंदिर-मस्जिद की कानूनी लड़ाई तेज हो रही थी। इसी बीच काशी की दीवानी अदालत में भी एक मुक़दमा दाखिल हुआ जो आज भी लंबित है। यही वो मुक़दमा है जो काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद का भविष्य तय करेगा और जिसके फैसले का इंतजार देश के करोड़ों लोगों को है।

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ा विवाद सदियों पुराना है। इसी विवाद के चलते साल 1991 में काशी की अदालत में यह मुक़दमा दाखिल किया गया था। इस मुकदमे की वर्तमान स्थिति क्या है और वे कौन से मुद्दे हैं जिन पर सबसे ज्यादा विवाद, ये समझने के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास पर एक नजर डालना बेहद जरूरी है।

श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के लिए जमीन अधिग्रहण में 390 करोड़ रुपए लगे हैं। जबकि इसके निर्माण में 340 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। कुल मिलाकर करीब 800 करोड़ रुपए की योजना होगी। फोटो- ओपी सोनी

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास अयोध्या की तरह विवादित नहीं है। यहां कई बातें क्लियर हैं जिन्हें सभी पक्ष सहज स्वीकार करते हैं। मसलन, यह तथ्य विवादित नहीं है कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण औरंगजेब ने करवाया था और यह निर्माण मंदिर तोड़कर किया गया था। औरंगजेब से पहले भी काशी विश्वनाथ मंदिर कई बार टूटा और कई बार बनाया गया। लेकिन साल 1669 में औरंगजेब ने इसे तोड़कर वहां ज्ञानवापी मस्जिद बनवा दी। मंदिर को फिर से बनाने के कई असफल प्रयासों के बाद आखिरकार साल 1780 में अहिल्या बाई होलकर ने मस्जिद के पास एक मंदिर का निर्माण करवाया और यही आज काशी विश्वनाथ मंदिर कहलाता है।

ये इतिहास का वह पहलू है जो निर्विवाद है। इससे अलग जो विवादित पहलू हैं उन्हें समझने की कोशिश न्यायालय में चल रहे मुकदमे से करते हैं। यह मुक़दमा है ‘वाद संख्या 610 सन 1991।’ यह एक रिप्रेसेन्टेटिव सूट यानी प्रतिनिधित्व वाद है और इसका नाम है ‘प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर व अन्य बनाम अंजुमन इंतजामिया मसाजिद व अन्य।’

साल 1991 में यह मुक़दमा काशी के तीन लोगों ने दाखिल किया था। इनमें पहले थे पंडित सोमनाथ व्यास, दूसरे थे पंडित रामरंग शर्मा और तीसरे थे हरिहर पांडेय। इन तीनों के अलावा इस मुक़दमे के चौथे वादी थे ‘स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर।’ इस पक्ष की पैरवी बीते कई सालों से अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी कर रहे हैं। वे कहते हैं, ‘हमारा पक्ष बेहद मज़बूत है और हमें एक सौ एक प्रतिशत विश्वास है कि फैसला हमारे पक्ष में होगा।’ दूसरी तरफ़ अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के संयुक्त सचिव और प्रवक्ता एसएम यासीन भी ठीक ऐसा ही दावा करते हुए कहते हैं, ‘इस मामले में हमारा पक्ष पूरी तरह से संविधान सम्मत है और हम आश्वस्त हैं कि क़ानूनन हमारा पक्ष ज़्यादा मज़बूत है।’

श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर में करीब 3100 वर्ग मीटर में मंदिर परिसर बनेगा। पूरे परिसर में मकराना और चुनार के पत्थर लगेंगे। फोटो- ओपी सोनी

1991 से चल रहा यह पूरा मामला मुख्यतः उसी साल लागू हुए एक केंद्रीय कानून के इर्द-गिर्द घूमता है। इस कानून का नाम है ‘प्लेसेज ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजन) ऐक्ट, 1991’ या उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991। यह क़ानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 के दिन जो धार्मिक स्थल जिस समुदाय या संप्रदाय के पास था, वो अब भविष्य में भी उसी का रहेगा। यानी आज़ादी के दिन जहां मंदिर था वहां अब मंदिर ही रहेगा भले ही आज़ादी से पहले वहां मस्जिद हुआ करती हो। और ऐसे ही जहां मस्जिद है वहां अब मस्जिद की ही दावेदारी रहेगी भले ही वहां पहले कोई मंदिर क्यों न रहा हो। अयोध्या को इस क़ानून की परिधि से बाहर रखा गया था लेकिन काशी समेत तमाम अन्य धर्मस्थलों पर यह लागू हुआ और आज भी लागू है।

यही कारण है कि तमाम हिंदू संगठन इस क़ानून को में संशोधन की मांग उठाते रहे हैं। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में भी एक याचिका दाखिल की गई है जिसका नतीजा आना अभी बाकी है। कानूनी नज़रिए से देखें तो इस अधिनियम के लागू होते ही सभी धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो गए। अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के प्रवक्ता एसएम यासीन कहते हैं, ‘यह क़ानून देश की संसद ने बनाया है और सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इस पर महर लगाई है। अयोध्या मामले पर फैसला सुनाते हुए भी संवैधानिक पीठ ने यह बात दोहराई है कि देश के तमाम अन्य धर्मस्थलों पर 1991 का ऐक्ट लागू होता है और इससे छेड़छाड़ नहीं हो सकती। इस ऐक्ट को बदलना संविधान के खिलाफ है और जब तक यह ऐक्ट है हमारा दावा सबसे मज़बूत है।’

दूसरी तरफ़ हिंदू पक्ष के वकील विजय शंकर रस्तोगी एक नई बात कहते हैं। वे बताते हैं कि यदि 1991 के क़ानून को न भी बदला जाए तब भी हिंदुओं का पक्ष कमजोर नहीं है। वे कहते हैं, ‘हम 1991 के क़ानून को अगर मान भी लें तो यह तो तय करना ही होगा कि 15 अगस्त 1947 के दिन उस जगह पर मंदिर थी या मस्जिद थी। हमारा कहना है कि उस जगह पर हमेशा से मंदिर ही रहा है और इसकी जांच के लिए पुरातात्विक सर्वेक्षण करवा लिया जाए। इसी से दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।’

ज्ञानवापी मस्जिद काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर से सटी हुई है। इस मस्जिद को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है।

हालांकि 1991 के मूल वाद में हिंदू पक्ष की मांग है कि विवादित क्षेत्र स्वयंभू विश्वेश्वर का ही अंश है लिहाज़ा वह इलाका हिंदुओं को सौंप दिया जाए। लेकिन फ़िलहाल यह पूरा मामला विजय शंकर रस्तोगी द्वारा उठाई गई पुरातात्विक सर्वेक्षण की मांग पर आकर सिमट गया है। रस्तोगी इस विवाद से जुड़े एक और पहलू को उठाते हुए बताते हैं, ‘मुस्लिम पक्ष ने बाकायदा लिखित में न्यायालय से कहा है कि विवादित मस्जिद ‘अहल ए सुन्नत’ से वहां क़ायम है। इसका मतलब है वो दावा कर रहे हैं कि जब से क़ुरान नाजिर हुई है, तब से उस स्थान पर मस्जिद है। यह दावा ऐतिहासिक प्रमाणों के विपरीत है लिहाज़ा मुस्लिम पक्ष अपने ही दावों में फंस गया है।’

विजय शंकर रस्तोगी की इस बात को सिरे से नकारते हुए एसएम यासीन कहते हैं, ‘कोई नासमझ भी यह बात कैसे कह सकता है कि पैगम्बर मोहम्मद के समय से ज्ञानवापी मस्जिद मौजूद रही है। रस्तोगी जी अपनी समझ के अनुसार इसकी व्याख्या कर रहे हैं। मुस्लिम पक्ष ने अगर कहीं ‘अहल ए सुन्नत’ जैसी बात का जिक्र किया भी है तो उसका मतलब ये है कि यह सुन्नी समुदाय के लोगों की मस्जिद है।’

महारानी अहिल्‍याबाई ने देश के कई मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया। उन्होंने बनारस के मशहूर काशी विश्‍वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था।

15 अगस्त 1947 के दिन विवादित स्थल पर मंदिर था या मस्जिद थी? यह सवाल उठाकर विजय शंकर रस्तोगी ने इस पूरे मामले में एक नई बहस छेड़ दी है जिसपर दोनों ही पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं। अधिवक्ता रस्तोगी कहते हैं, ‘विवादित स्थल पर गुंबद के नीचे आज भी शिवलिंग विराजमान है जिससे साफ है कि वह मस्जिद नहीं बल्कि मंदिर है। इसके अलावा बेसमेंट के हिस्से पर आज भी मुस्लिम पक्ष का नहीं बल्कि हिंदू पक्ष का ही क़ब्ज़ा है। तो यह कैसे कह सकते हैं कि वो एक मस्जिद है?’

इसके जवाब में एसएम यासीन कहते हैं, ‘15 अगस्त के दिन वहां मस्जिद थी और एक नहीं बल्कि कई तरीकों से स्थापित होता है। पहला तो यही कि जब हिंदू पक्ष ख़ुद ही कहता है कि औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बना दी थी तो फिर अब वो किस आधार पर कह रहा है कि वहां मस्जिद नहीं है। दूसरा, 1936 में दीं मोहम्मद व अन्य बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया’ नाम से एक मामले में फैसला आया था। उस दौर में मस्जिद के पिछले हिस्से में जनाजे के नमाज़ पढ़ी जाती थी। यह फैसला उसी से संबंधित था। इस फैसले में साफ कहा गया है कि वह जगह मुस्लिम वक्फ की सम्पत्ति है। साल 1942 में हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को सही माना है। ये दोनों फैसले सबूत हैं कि 1947 के दौरान वो जगह घोषित तौर से मुस्लिम वक्फ की संपत्ति थी।’

इन्हीं तर्कों के साथ आगे बढ़ रहे इस मामले में अगली सुनवाई अब एक सितंबर को होनी है। आने वाले समय में इस मामले का नतीजा किसके पक्ष में होगा? इस सवाल पर दोनों ही पक्ष पूरे आत्मविश्वास के साथ एक ही जवाब देते हैं, ‘हमें देश के क़ानून, संविधान और न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है। फैसला हमारे हक़ में आएगा।’ काशी मथुरा बाकी है की अगली कड़ी में पढ़ें, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से ग्राउंड रिपोर्ट।

यह भी पढ़िए :

1. पहली रिपोर्ट : लॉकडाउन न हुआ होता तो अब तक या तो काशी विश्वनाथ मुक्त हो गया होता या हम जेल में बंद होते…

2. काशी के विश्वनाथ कॉरिडोर से ग्राउंड रिपोर्ट : पूरा बन जाने के बाद काशी विश्वनाथ धाम में 2 लाख लोग आसानी से आ सकेंगे, पहले सिर्फ 5 हजार की जगह थी

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Special Report from Kashi Vishwanath Temple